पटना. बिहार में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ज्यादतर विधायकों को अपने क्षेत्र में जनता के भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि विधायक सत्ताधारी या विरोधी दल के हैं। पांच साल बाद नजर आने पर जनता आक्रोशित है और वो अपना विरोध कर रही है. क्षेत्र में नेता जी को मुर्दाबाद, वापस जाओ जैसे परंपरागत नारो का सामना करना पड़ा रहा है. इतना ही नहीं जन प्रतिनिधियों पर जुबानी आक्रमण भी कर रहे हैं. कई जगह तो शारीरिक हमले का भाव भी प्रकट हो रहा है. अपशब्द भी कहे जा रहे.चुनाव से पहले माननीयों की फजीहत विकास के नाम पर हो रही है। दो टूक कहा जा रहा कि आपने विकास का वादा किया था, मगर वह पूरा नहीं हुआ.तस्वीर का दूसरा पहलू केंद्र और राज्य सरकार दिखा रही हैं.


इसे देख कर यही धारणा बन रही है कि बीते कुछ वर्षों में विकास के अलावा कुछ हुआ ही नहीं.तब जनता इतनी नाराज क्यों है? पांच साल पहले जिन्हें सिर-आंखों पर बिठाकर विधानसभा में भेजा था, वे क्यों खदेड़े जा रहे हैं? दरअसल, विधायकों के साथ क्षेत्र में जो कुछ हो रहा है, वह अप्रत्याशित नहीं है.

असल में विकास की इतनी अधिक चर्चा हो गई है कि हर गली-मोहल्ले वालों को लग रहा है कि बगल वाले का विकास हो गया, मेरा नहीं हुआ. विकास को लेकर लोग एक तरह से मनोवैज्ञानिक दबाव में जी रहे हैं.

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