Bihar Assembly Election: दूसरों से ज्यादा अपनों ने लालू को दिए गहरे जख्म #BiharPoliticsNews

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पटना.  लालू जेल में हैं, सामने विधानसभा चुनाव है और पार्टी में मची भगदड़ से कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरने लगा है. लालू की अनुपस्थिति में तेजस्वी को कई मोर्चों पर अपने दम से ही मुकाबला करना होगा.राजद के 5 विधान पार्षदों ने दल बदलकर लालू प्रसाद के नए नेतृत्व को तगड़ी चोट पहुंचाई है। इनके इस फैसले से राबड़ी देवी की कुर्सी भी खतरे में पड़ गई है. भाजपा नेता और बिहार सरकार के मंत्री मंगल पांडेय ने तो साफ कहा है कि राबड़ी ही नहीं तेजस्वी की कुर्सी भी कुछ दिनों का मेहमान है.

राजनीतिक पंड़ित इसका अपने अपने स्तर से गुणा भाग कर रहे हैं. लेकिन, इधर लालू प्रसाद को सबसे ज्यादा जख्म तो दशकों से भरोसेमंदों की सूची में नंबर एक पर शामिल रघुवंश प्रसाद सिंह के तेवर ने दिया है। चुनाव से पहले एक साथ मिले कई झटकों से नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को संभलना आसान नहीं होगा। पार्टी में भगदड़ के हालात से कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी असर पड़ सकता है। लालू पटना से दूर रांची में हैं और तेजस्वी को कई मोर्चों पर अपने दम से ही मुकाबला करना है।

पार्टी में चल रहा समीक्षा का दौर
पार्टी में मची भगदड़ के बाद राजद में समीक्षा का दौर चल रहा है. पार्टी इसपर मंथन कर रही है कि पांच विधान पार्षदों ने क्यों बदला. संजय प्रसाद को जाना था, यह हर कोई जान रहा था लेकिन उनके साथ चार अन्य ने क्यों अपना पाला बदल लिया. वजहें तलाशी जा रही हैं कि संजय प्रसाद के अतिरिक्त कमर आलम, राधा चरण सेठ, रणविजय सिंह और दिलीप राय ने पाला क्यों बदला? इनके जाने के समाचार ने राजद को गहरा सदमा पहुंचाया है। सबसे बड़ा झटका कमर आलम के रूप में लगा है, जिन्हें लालू ने दो बार से राजद का राष्ट्रीय प्रधान महासचिव बनाया था.

उन्होंने भी लालू का साथ छोड़ दिया. पार्टी सूत्रों का कहना है कि कमर आलम की नाराजगी उसी दिन से शुरू हो गई थी, जब विधान परिषद में उनकी वरिष्ठता को नजरअंदाज करते हुए सुबोध राय को चीफ व्हीप बना दिया गया था। आलम की तुलना में सुबोध की राजनीति बिल्कुल नई है। संगठन में भी उनका स्थान बहुत ऊपर था। वह सदन में राबड़ी देवी के बाद दूसरे नंबर का दर्जा चाहते थे। संसदीय बोर्ड की बैठकों में भी उन्हें वह स्थान नहीं मिलता था, जिसके वह हकदार थे। कहा जा रहा है कि वे इसी कारण से नाराज थे.

लालू के बेहद करीबियों में शामिल रणविजय सिंह को लेकर भी लालू प्रसाद काफी परेशान हैं. पार्टी छोड़ने की इनका कहानी थोड़ी अलग है। ये कुछ दिन पहले ही राजनीति में आए और लालू परिवार से जुड़कर पार्टी में छा गए थे। कहा तो यह जा रहा था कि वे लालू परिवार के बेहद करीबी रहे भोला यादव की जगह ले ली और रांची जेल अस्पताल में इलाज करवा रहे राजद प्रमुख के कर्ताधर्ता बन गए थे। रांची में रहकर रणविजय ने महीनों तक लालू की जरूरतों की परवाह की। लेकिन लालू परिवार ने जब उनको किनारे किया तो वे भी राजद से अपने को किनारे कर लिया.

राधाचरण सेठ का व्यक्तिगत कारण है. उनको राजद की राजनीति रास नहीं आ रही थी। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी भाजपा से जुड़ी है। उनके भाई हाकिम प्रसाद के भाजपा से पुराने नेता रहे हैं. कहा जा रहा है कि वह भाजपा से ही विधानसभा चुनाव लडऩे की तैयारी भी कर रहे हैं।

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