WhatsApp Image 2019 07 24 at 23.09.33 - नेतृत्व पर महागठबंधन में मारामारीः जीतनराम मांझी को लेकर शिवानंद ने क्यों कही ये बात                                           अरुण कुमार पाण्डेय

पटना. बिहार में सत्तारूढ़ राजग को चुनौती देने के लिए बने महागठबंधन में नेतृत्व को लेकर मारामारी तेज हो गयी है। राज़द तेजस्वी को महागठबंधन का नेता नहीं माननेवाले नेताओं से परेशान है। पार्टी के उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने कहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी अभी नेतृत्व का का सवाल उठाकर महागठबंधन का उपहास कराने के साथ खुद भी इसके पात्र बन रहे हैं। कांग्रेस नेता सदानंद सिंह ने भी लालू के छोटे लाल ,पूर्व उप मुख्यमंत्री एवं विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव को नेता मानने से साफ इंकार कर दिया है वहीं हम के प्रवक्ता दैनिक रिजवान ने शिवानंद तिवारी को खरी-खोटी सुनाई है।

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शिवानंद तिवारी ने कहा-

जीतन बाबू अधीर हो रहे हैं. महागठबंधन का नेतृत्व कौन करेगा या बहुमत मिलने पर कौन मुख्यमंत्री बनेगा यह मीडिया में तय नहीं होता है. इसको महागठबंधन के सभी घटक दल आपस में बैठकर तय करेंगे. अभी दो-तीन दिन पहले महागठबंधन की बैठक हुई थी. उस बैठक में जीतन बाबू भी मौजूद थे. अगर उनके मन में कोई बात थी तो उसको उस बैठक में रखकर सुलझा लिया जाना चाहिए था. वहाँ इस विषय पर आप मौन रहे. अब मीडिया के ज़रिए सवाल उठाकर जीतन बाबू विरोधियों को मौक़ा दे रहे हैं कि वे हमारा उपहास उड़ाएँ. इससे सिर्फ महागठबंधन का ही उपहास नहीं उड़ रहा है बल्कि जीतन बाबू भी उपहास का पात्र बन रहे हैं. जीतन बाबू महागठबंधन के सम्मानित नेता हैं. उनसे नम्रता पूर्वक मैं अनुरोध करता हूँ कि इस प्रकरण में उन्हें जो कुछ भी कहना हो, महागठबंधन के भीतर कहे. इस विषय को सार्वजनिक विवाद का विषय न बनाएँ. यह शिवानंद तिवारी का 30अगस्त का बयान है।

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नैतिकता न सिखायें शिवानंद-दानिश

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (से०) के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ दानिश रिजवान ने जीतन राम मांझी की काबिलियत पर राजद नेता शिवानंद तिवारी के दिए बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की । कहा कि शिवानंद तिवारी जैसे स्वार्थी नेताओं के कारण ही आज राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद जेल की यातना सहने को मजबूर हैं। उनके इन्हीं लक्षण के कारण जदयू में अपमानित होकर निकलना पड़ा। जब उन्हें जदयू में सम्मान नहीं मिल रहा था और अपमान का घूंट पीना पड़ रहा था तो जनता दल यूनाइटेड के राजगीर शिविर में शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार को कहा था की बुड्ढा सुग्गा कभी पोस नहीं खाता तो फिर आखिर किस कारण से इस उम्र में लालू जी के पोसूआ बनने की कोशिश कर रहें हैं।जिस शिवानंद तिवारी ने अपने स्वार्थ की राजनीति के लिए जनेऊ तोड़ा और वह आज एक वार्ड का चुनाव तक कहीं से जीतने की हैसियत नहीं रखते उन्हें जीतन राम मांझी पर बयान देने का नैतिक अधिकार नहीं है । जीतन राम मांझी का लंबे समय का राजनीतिक अनुभव व उनके द्वारा कम समय के मुख्यमंत्रित्व काल में किए गए कार्य और उनके द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में लिए गए निर्णय की काबिलियत को जनता ने देखा है। उनके सारे निर्णय जनहित में थे। आज राज्य सरकार भी उनके लिए गए निर्णयों में थोड़ा बहुत संशोधन कर उन्हीं के निर्णय पर आगे चल रही है । शिवानंद तिवारी जी का इस तरह का बयान उनकी बढ़ती उम्र की थकान को दर्शाता है ।

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कांग्रेस भड़की, रालोसपा पर नजर

कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह ने भी तेजस्वी यादव को गठबंधन का नेता मानने से साफ इंकार किया। कहा लोक सभा चुनाव में भी तेजस्वी महागठबंधन के नेता नहीं थे । राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने चुनाव लड़ी। सदानंद सिंह ने विधान सभा का अगले वर्ष होने वाले चुनाव के लिए भी तेजस्वी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने से भी इंकार किया। कहा विधान सभा चुनाव के बाद विधायक चुनेंगे सीएम।लोक सभा में एक भी सीट जीते नहीं और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की हो रही बात।मालूम हो कि लोकसभा चुनाव में जीरो पर आउट होने के बाद राजद ने बैठक कर तेजस्वी की नेतृत्व में विधान सभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। परंतु उसके सहयोगी दलों को तेजस्वी का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं है। जीतने राम मांझी तो पार्टी की बैठक कर तय कर चुके हैं उनकी पार्टी महागठबंधन से अलग अपने बूते विधान सभा चुनाव लड़ेगी। यह सवाल भी लोगों में कौंध रहा है कि मुख्यमंत्री बनने के लिए जदयू का साथ छोड़ रालोसपा बनाने वाले उपेन्द्र कुशवाहा विधान सभा चुनाव तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ेंगे या कांग्रेस के साथ मिलकर अलग चुनाव लड़ेंगे।

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सुशील मोदी का तंज

उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने महागठबंधन में नेतृत्व को लेकर मारामारी पर जमकर तंज कसा है। उन्होंने कहा कि संसदीय चुनाव से पहले जिस तरह राहुल गांधी, चंद्रबाबू नायडू, मायावती और शरद पवार तक में प्रधानमंत्री बनने की कामना जग गई थी, उसी तरह इन दिनों बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री-पद के नित नये उम्मीदवार सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति संभावनाओं का खेल है और सपने देखने का हक भी सबको है, इसलिए हर दल में सपने देखने की होड़ दिलचस्प हो गई है। सुशील मोदी ने कहा कि सीएम-पद के एक स्वप्नदर्शी को जब दूसरे दल के स्वप्नदर्शी अधिक उम्र का हवाला देकर नींद से जगाना चाहते हैं, तब उन्हें कडे़ प्रतिवाद का सामना करना पड़ता है और कहा जाता है कि उम्र नहीं, तजुर्बा ज्यादा मायने रखता है। तीसरे दल के स्वप्नदर्शी बीच का रास्ता निकालते हुए पहले-दूसरे को सलाह देते हैं कि यह समय निजी स्वार्थ से ऊपर उठ कर महागठबंधन की जीत पर ध्यान देने का है। जब तीन बड़े झगड़ रहे होते हैं, तभी एक युवा स्वप्नदर्शी प्रकट होकर अपनी दावेदारी भी पेश कर देता है। बिहार में चुनाव अभी 14 माह दूर है, लेकिन सपनों का बाजार अभी से गुलजार है।

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