बिहार में बाढ़ का कहरः कोसी में तस्कर कर रहे डॉल्फिन का शिकार

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सुपौलः कोसी नदी के जलस्तर में आयी गिरावट के बाद तस्करों की सक्रियता भी बढ़ गई है। नदी में पानी घटने के बाद कोसी के मासूम और आंशिक रूप से दृष्टिहीन डॉल्फिन पर है, जिसका शिकार किया जा रहा है। इसकी पुष्टि बुधवार को डीएम-एसपी के निरीक्षण के दौरान भी हुई। दरअसल कोसी और गंगा बेसीन में डॉल्फिन की विशेष प्रजाति, जिसे गांगेय डॉल्फ़िन कहते हैं, पाई जाती है। इसके संरक्षण को लेकर पर्यावरण एवं वन विभाग द्वारा विशेष अभियान चलाया जा रहा है। बीते साल भी भागलपुर की एक विशेष टीम डॉल्फिन संरक्षण को लेकर विशेष कार्ययोजना तैयार करने के लिए पहुंची थी। तब कोसी के बहाव वाले क्षेत्रों में डॉल्फिन के प्रवास वाले क्षेत्रों को भी चिह्नित किया गया और मछुआरों को हिदायत भी दी गई। लेकिन बाढ़ के बीच इस दिशा में प्रशासनिक गतिविधि लगभग थम सी गई है।

वन विभाग के अधिकारी नदी के इलाके में लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं। नतीजा है कि कोसी के बहाव क्षेत्र में डॉल्फिन के तस्करों की सक्रियता बढ़ गई है। बुधवार को डीएम-एसपी बाढ़ प्रभावित इलाकों का जायजा लेने पहुंचे थे। इस दौरान पिपरा में नदी के बहाव से सटे इलाके में दो डॉल्फिन को लटका कर उसका तेल निकाला जा रहा था। वहां मौजूद स्थानीय रामजी ऋषिदेव ने बताया कि डॉल्फिन किसी और ने लटकाया है, उसे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। हालांकि डॉल्फिन को देखने से ही स्पष्ट हो रहा था कि उसकी मौत तीन से चार दिन पहले हुई थी और डॉल्फिन को प्रोफेशनल तरीके से लटका का उसका तेल निकाला जा रहा था।

डीएम के निर्देश पर जब्त किया गया डॉल्फिन
भारतीय वन्य पशु अधिनियम के परिशिष्ट एक के तहत संरक्षित प्रजाति है। 5 अक्टूबर 2009 को डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है। वर्ष 1996 में ही इसे टर्नेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन ऑफ नेचर ने विलुप्तप्राय जीव घोषित किया है। लिहाजा डीएम महेंद्र कुमार ने गंभीरता से लेते हुए इसे जब्त करने का निर्देश दिया। वही एसपी मृत्युंजय कुमार चौधरी ने स्थानीय लोगों से डॉल्फिन के बाबत जानकारी लेने का प्रयास किया। हालांकि अधिकारियों को कोई विशेष जानकारी नहीं मिल पाई। इसके बाद सदर एसडीएम कयूम अंसारी, आरडीओ अनित कुमार व सीओ प्रभाष चंद्र लाभ आदि ने अपनी बोट पर डॉल्फिन जब्त कर लिया। हालांकि सूत्रों का दावा है कि तस्करी का यह कारोबार लंबे समय से चल रहा है, जिसकी वजह से अब कोसी दियारा इलाके में डॉल्फिन का अस्तित्व खतरे में है। लेकिन दुर्गम दियारा क्षेत्र होने के कारण एक तरफ जहां तस्करों के लिए मुफीद साबित हो रही है, वही अधिकारी कागजी कोरम पूरा करने में जुटे हैं।

वर्ष 2017 में मिले थे 62 डॉल्फिन:: जानकारी अनुसार वर्ष 2017 में पूर्वी कोसी तटबंध के हाटी घाट से लेकर कोसी महासेतु तक महासेतु से शून्य किलोमीटर तक का सर्वेक्षण कराया गया था। इसमें 21 युवा, 37 किशोर और 4 बच्चे डॉल्फिन मिले थे। तत्कालीन डीएफओ सुधीर कुमार कर्ण ने सरकार को इसका सर्वेक्षण कराने का प्रस्ताव भेजा था। साथ ही इस इलाके को वण अभ्यारण्य क्षेत्र घोषित करने का प्रस्ताव भी तैयार करने का निर्देश दिया। इसके बाद भागलपुर की विशेष टीम ने तीन फेज में कोसी के शून्य किलोमीटर से सहरसा तक सर्वे किया और डीएफओ के प्रस्ताव पर सहमति जताते हुए राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी। तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के डॉल्फिन विशेषज्ञ प्रो सुनील चौधरी बताते हैं वर्ष 2018 के सर्वे में 76 से 80 डॉल्फिन सुपौल जिला के नदी बहाव वाले क्षेत्र में पाए गए हैं।

महंगा बिकता है डॉल्फिन का तेल, इसलिए होता है शिकार
तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के डॉल्फिन विशेषज्ञ प्रो सुनील चौधरी बताते हैं कि गांगेय डॉल्फिन का शिकार इसके तेल के लिए किया जाता है। यह काफी महंगा बिकता है। इस तेल का प्रयोग मछुआरे मछली पकड़ने में करते हैं। इसके तेल से मछलियां आकर्षित होती हैं और मछली आसानी से पकड़ी जाती है। इसके तेल को लेकर एक भ्रांति भी है कि यह दर्द-निवारक है। साथ ही मस्तिष्क के न्यूरो संबंधित समस्या, हडि्डयों के दर्द, प्रसुता महिला के लिए भी उपयोगी है। हालांकि इसके औषधिय गुण की कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं है। उनके अनुसार डॉल्फिन के चमरे के नीचे 4-5 सेंटिमिटर वसा होती है, जिसे ब्लडर कहते हैं। बहुत कम तापमान में यह तेल में बदल जाता है, जो काफी दुर्गंध करता है। सामान्य लोग इसके तेल के दुर्गंध को बर्दाश्त भी नहीं कर सकते हैं। लेकिन मछलियाें की कुछ प्रजाति को आकर्षित करने के लिए यह दुर्गंध काफी उपयोगी है। बाजार में यह तेल सुलभ तरीके से बिक जाती है।

सुपौल से सोनी कुमारी की रिपोर्ट

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9 comments

  1. अभय 18 July, 2019 at 11:33 Reply

    यह बहुत दुःखद स्थति है। सरकार को तुरन्त रोकना चाहिये।

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