कोरोना के कारण इस बार विद्यार्थियों का पूरा सेशन घर पर ही निकल गया। इसके बावजूद 78.17 प्रतिशत रिजल्ट आया, यह बिहार के विद्यार्थियों पर गर्व करने लायक बात है।

साल के 365 दिनों में बिहार के सरकारी स्कूल 251 दिन पढ़ाते हैं, इस साल एक भी दिन नही पढ़ाया। CBSE के प्राइवेट स्कूलों ने ऑनलाइन क्लास लिया लेकिन बिहार बोर्ड से जुड़े स्कूलों में वह भी नहीं। स्कूलों के शिक्षक मोबाइल तक पर उपलब्ध नहीं थे, कोचिंग-ट्यूशन तो बंद था ही। परीक्षा दिलाने आए अभिभावकों ने भी कहा था कि मैट्रिक परीक्षा में जो भी पास हो जाए, उस पर गर्व करना चाहिए।

इस बार किसी छात्र ने 10वीं के क्लासरूम में कदम तक नहीं रखा। यह पहला ऐसा मौका है, जब बिहार बोर्ड के बच्चों ने बिना क्लास किए मैट्रिक की परीक्षा दी हैं। कोरोना के कारण 24 मार्च को बिहार समेत पूरे देश में लॉकडाउन लगाया गया था। इसके बाद से स्कूल बंद हो गए थे।

226 दिन बाद 11 नवंबर को सिर्फ सेंटअप एग्जाम देने के लिए बच्चों ने स्कूल का मुंह देखा। इसके 95 दिन बाद 4 जनवरी से 8वीं से ऊपर के स्कूल तो खुले, लेकिन इससे इन छात्रों को कोई लाभ नहीं हुआ, क्योंकि सेंटअप के बाद परंपरा के तहत इन्हें पढ़ाया नहीं गया।

सेंटअप एग्जाम भी बिना पढ़े दिया
बिहार के सरकारी स्कूलों में सेशन अप्रैल में शुरू होता है। सालभर में 60 दिन सरकारी छुटि्टयां और 54 रविवार को जोड़ कर कुल 114 दिनों की छुटि्टयां रहती हैं। साल के 365 दिन में 114 दिन काम किए जाए तो एक सेशन में 251 दिनपढ़ाई होती है।

10वीं के बच्चों की पढ़ाई इससे भी कम होती है, क्योंकि सेंटअप एग्जाम नवंबर में ही हो जाता है। मोटे तौर पर देखें तो सात महीना, लेकिन इसबार तो पूरा सेशन ही बिना क्लास किए निकल गया।

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